वीरांगना महारानी पद्मावती


इतिहास में  मेवाड़ और वहां के राजपूताना योद्धाओ का शौर्य स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहा हैं।  मेवाड़ में चित्तौड़ गढ़ पर तो सदैव ही यवन आतताइओ की नजर रही है और इस भूमि पर राजपूत योद्धाओं एवं  यवनों के मध्य कई युद्ध हुवे भी हैं, जिनमें राजपूत योद्धाओं ने यवनों के दाँत खट्टे कर दिए थे।  तेरहवी शताब्दी में चित्तौड़ गढ़ के राज सिंहासन पर राणा लक्ष्मण सिंह आसीन थे, जिनकी आयु उस समय मात्र बारह वर्ष की थी।  राज्य की देख रेख उनके काका श्री भीम सिंह (जिन्हें रतन सिंह भी कहा करते थे) करते थे।  इनके नाम को लेकर कई इतिहासकारों में मतभेद है, किन्तु अधिकांशतः रतन सिंह नाम ही मान्य है। रतन सिंह जी की पत्नी का नाम पद्मावती था, जिन्हें पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता रहा है। मेवाड़ में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत में महारानी पद्मावती के समान सौंन्दर्य किसी का नहीं था, वे अपने नाम के अनुरूप ही अपूर्व सुंदरी थी।  महारानी पद्मावती सुन्दर होने के साथ ही वीरांगना और बुद्धिमती भी थी।  महारानी पद्मावती की अपूर्व सुंदरता की चर्चा सुनकर ही अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने चित्तौड़ गढ़ पर आक्रमण किया था।


इतिहास इस बात का साक्षी है कि अल्लाउद्दीन खिलज़ी भारत से हिंदुत्व का दमन कर ईस्लामी प्रभुता को दृढ़ करना चाहता था और विश्व विजय का सपना देखता था।  अल्लाउद्दीन खिलज़ी द्वारा हिन्दुओं पर जो अत्याचार व् अनाचार किये गए, उसका भी इतिहास साक्षी है। अल्लाउद्दीन खिलज़ी की विजय यात्रा में रणथम्बौर और चित्तौड गढ़ बहुत बड़े अवरोध थे।  अल्लाउद्दीन खिलज़ी के आक्रमण का समाचार सुनकर राजपूतों ने भी ठान लिया था कि अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए यदि उन्हें अपने प्राणों की भी आहुति देना पड़ी तो देंगे। अल्लाउद्दीन खिलज़ी को काफी प्रयास के बाद भी सफलता नहीं मिली। दोनों और की सेनाएँ शिथिल होने लग गई थी।

अल्लाउद्दीन खिलज़ी जिसने महारानी पद्मावती के लिए ही आक्रमण किया था और पीछे हटने में भी संकोच हो रहा था, ऐसी स्थिति में उसने चालाकी से राणा जी को सन्देश भिजवाया कि यदि महारानी पद्मावती को एक बार दिखा भर दें, तो वह वापस दिल्ली लौट जावेगा। हांलाकि राणा जी को यह बात काफी अप्रिय लगी किन्तु  महारानी पद्मावती द्वारा दूरदर्शिता से काम लेते हुवे अपने पति से कहा कि मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण चित्तौड़ तबाह हो जाये और यहाँ की प्रजा परेशान हो, राजपूत नारी जानती है कि आपत्तिकाल में उसे क्या करना है, इसलिए आईने में मुँह दिखा देने में कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए।  इस पर राणा जी ने  अल्लाउद्दीन खिलज़ी को कहला भेजा कि महारानी प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आएगी  यदि वह आईने में रानी का अक्स देखना चाहे वह देख सकता है।

अल्लाउद्दीन खिलज़ी भी पस्त  हो चुका था और उसमें भी अधिक दिन तक वहां पड़ाव डालकर रुकने की शक्ति नहीं थी, उसे वापस दिल्ली लौटने का बहाना भी मिल गया, तो  स्वीकार कर लिया।  जब अल्लाउद्दीन खिलज़ी राज महल में लाया गया और आईने के सामने उसे बैठाया गया।   महारानी पद्मावती भी निश्चित स्थान पर आकर  खड़ी हो गई। अल्लाउद्दीन खिलज़ी जोकि महारानी की और पीठ किये बैठा था और सामने आईने में महारानी का अपूर्व सौंदर्य युक्त चेहरा देखकर दंग रह गया आईने से नजरें नहीं हट  पा रही थी।  कामावेश में उसने उसी समय निश्चित कर लिया कि चित्तौड़ गढ़ पर आधिपत्य करके ही रहेगा। महारानी पद्मावती के लिए व्याकुल अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने येन केन प्रकारेण रतन सिंह को बंदी बना कर कैद  लिया। विभिन्न विभिन्न इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन खिलज़ी द्वारा महारानी पद्मावती को देखने के बारे में तथा रतन सिंह को बंदी बना लेने  के बारे में कई मतभेद हैं।

रतन सिंह को कैद कर लेने के बाद अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने  राणा जी के सामने यह प्रस्ताव भेजा कि यदि पद्मावती उसको दे दी जाय तो रतन सिंह को छोड़ देगा।  जब राजपूतों  को यह बात मालुम हुइ तो उन्होंने रतन सिंह को विष भेजने का निश्चय किया, जिससे कि रतन सिंह आत्मयज्ञ कर स्वर्गवासी हो जाय। किन्तु महरानी पद्मावती भी काफी चतुर थी, उन्होंने कूटनीति से काम लेते हुवे वीरवर गोदा और उनके बारह वर्षीय भतीजे बादल के माध्यम से अल्लाउद्दीन खिलज़ी को पत्र भेजकर कहा कि जब आप मुझे न पाने से ही मेरे स्वामी के प्राणों का हरण करना चाहते हैं तो मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण मेवाड़ का सूर्य अस्त हो, मैं आत्मसमर्पण के लिए तैयार हूँ,  परन्तु आप जानते हैं कि मैं राजरानी हूँ और अकेली आपके यहाँ नहीं आउंगी।  मेरे साथ मेरी सात सौ सहचरियां जो सभ्रांत राजपूतों की कन्याएँ और महिलाएँ हैं, वे सभी साथ रहेगी।  कुछ मेरे साथ दिल्ली जाएगी, कुछ चित्तौड़ वापस लौट आएगी।  आपको आत्मसमर्पण करने के पहले मैं अपने पति के चरणों के दर्शन करना चाहूँगी।  कारागार के सामने किसी भी मुस्लिम सैनिक का पहरा नहीं होना चाहिए। यदि आपको यह शर्त स्वीकार हो तो मैं आने का प्रबंध करूँगी। महारानी पद्मावती के सौंदर्य और कामावेश से कामान्ध  अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने बगैर कोई विचार किये प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

राजपूत सैनिक अपने शास्त्रों को कपड़ों में छिपाकर कहारों की वेशभूषा में डोलियां उठाकर चल पड़े प्रत्येक डोली  के अंदर दो और बाहर चार से छः राजपूत थे।  सात सौ डोलियों के साथ बयालिस सौ राजपूत वीर गोरा और बादल (चाचा भतीजे) के साथ निकल पड़े।  यहाँ महारानी भी साथ गई थी या नहीं गई थी इस बारे में कई  इतिहासकारों में  मतभेद  है।  लेकिन कहा जाता है कि जिस सुन्दर पालकी में महारानी पद्मावती के होने का बताया गया था उसमें एक लौहार बैठा था। वीर राजपूतों ने वहां पहुंचकर रतन सिंह को कैद से छुड़ा लिया और दोनों और के सैनिकों में भीषण युद्ध हुवा, जिसमें वीरवर गोरा वीरता से लड़ते हुवे वीरगति को प्राप्त हुवे।  अल्लाउद्दीन खिलज़ी भी परास्त हुवा और रतन सिंह महारानी पद्मावती की योजना  से सकुशल लौट आये।

अल्लाउद्दीन खिलज़ी को अपनी इस पराजय का बड़ा दुःख था, कुछ समय बाद उसने काफी बड़ी सेना लेकर पुनः चित्तौड़ गढ़ पर चढाई कर दी। पिछले युद्ध से बचे  राजपूत वीरों ने केशरिया बाना पहनकर तलवारें लेकर रणभूमि के लिए कूच किया।  भीषण युद्ध हुवा, राजपूत वीरों ने सैकड़ों मुग़ल सैनिकों का सफाया कर दिया।  इस युद्ध में रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हुवा।

उधर राजपूत वीरांगनाओं ने भी बड़े साहस के साथ महारानी पद्मावती के नेतृत्व में अपने कर्तव्यों के पालन में जौहर यज्ञ किया।  महारानी पद्मावती की अनुमति से चित्तौड़ गढ़ की राजपूत वीरांगनाओं ने मिलकर एक विशाल कुण्ड में चिता जला दी।  अग्नि शिखाऐ आकाश पथ को चूमने लगी। महारानी पद्मावती ने उन वीरांगनाओं को कहा कि बहनों आज हम सब आर्य नारियों की मर्यादा की रक्षा  लिए, पवित्र सती धर्म की रक्षा के लिए और देश का मुख उज्जवल रखने के लिए अग्नि देवता  को अपने शरीर समर्पण कर रही हैं। यवन  भी देख लेंगे कि हमारे हृदयों में कितना आत्मबल और धर्मबल है।

हजारों राजपूत वीरांगनाऐं उस दहकते अग्निकुण्ड में कूद पड़ी।  देखते ही देखते सब कुछ समाप्त हो गया।  जिस सौन्दर्य को देखकर अल्लाउद्दीन खिलज़ी के ह्रदय में पाप और वासना जाग उठी थी, जिसके चरणों पर हिंदुस्तान का बादशाह लौटने को तैयार था, वह अपने कुल गौरव व आत्मरक्षा के लिए अग्नि में समा गई।  अल्लाउद्दीन खिलज़ी को उस विशाल किले में राख के सिवाय और कुछ भी नहीं मिला।
भारत की ऐसी महान वीरांगना महारानी पद्मावती को शत शत नमन।
 



    

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