हम कहाँ से कहाँ आ गए

मेरा महान देश (विस्मृत संस्कृति से परिचय) में दुर्गा प्रसाद शर्मा, एडवोकेट, इंदौर का सादर अभिनन्दन। हमारे बचपन का समय और आज का समय कितना बदल गया है हम क्या थे, कहाँ थे और आज क्या हो गए, कहाँ आ गए, इस सम्बन्ध में जब भी सोच विचार आता है तब यादों के कई पन्ने खुल जाया करते हैं साथ ही अपनी तब की स्थिति और आज के बच्चों की स्थिति को देखकर, विचार करके भी कई विचार मन में स्वतः ही आ जाते हैं, तुलनात्मक आकलन भी समक्ष आ जाता है, मन भर भी जाता है, आँखे नम भी हो जाती है। आज का यह 159 वां लेख अपने उन सभी बचपन के मित्रों, सहपाठियों और साथियों को समर्पित है, जिनके साथ हमने एक अलग ही जीवन व्यतीत किया जिसकी आज केवल कल्पना अथवा तुलना ही की जा सकती है।  आज उस समय के जीवन का विचार करना ही किसी स्वप्न से कम नहीं है।  हमें मिले उस जीवन और आज की वर्तमान पीढ़ी को मिले इस जीवन में कितना कुछ बदल गया है  फिर भी जो शांति और सुकून आभाव भरे समय में हमारे उस जीवन में था वह आज समस्त सुख सुविधाओं वाले समय में भी क्यों नहीं है, यह विचारणीय प्रश्न है।  
तख्ती, स्लेट, पेम, पैंसिल के बाद हमारे हाथों में आया था फाउन्टेन पेन अर्थात स्याही का पेन। उस समय सभी लोग अपने घरों में स्याही नहीं रखते थे। पेन में स्याही भरवाने भी दुकान पर जाते थे। स्कूल के इंटरवल के समय स्याही भरवाने के लिए भी लाइन में लगी है, हमारी पीढ़ी। अपना नंबर आने के पहले पेन का होल्डर खोल कर खड़े होना पड़ता था, दुकानदार ड्रापर से बुँदे गिनकर हमारे पेन में स्याही डालता था। स्याही हाथ पर गिर भी जाती थी जिसे माथे पर बालों से पोंछ लिया करते थे। स्याही से कभी हमारी शर्ट ख़राब हो जाती थी तो कभी निक्कर। आपस में झगड़ा होता था तो यही स्याही पेन से एक दूसरे पर स्याही छींट कर गुस्सा निकाल लिया करते थे। आज की पीढ़ी स्याही के बारे में जानती तक नहीं है, आज की पीढ़ी तो पेन भी यूज एण्ड थ्रो वाले प्रयोग कर रही है जिसका कि उपयोग किया और फैंका। 

हमारे उस दौर में शिक्षकों से काफी खौफ हुआ करता था, स्कूल में कुछ बोलने का तो सवाल ही नहीं था। कान पकड़ो, मुर्गा बनो, बेंच पर खड़े हो जाओ, हाथ ऊपर करके खड़े हो जाओ, खड़े होकर झुक कर पैर का अंगूठा पकड़ो, क्लास से बाहर खड़े जाओ, यह सब हमारी आम दिनचर्या की सजाएं हुआ करती थी, जिन्हें हमने हँसते हँसते सह ली। शिक्षकों मार भी खूब खाई और उनकी छड़ी भी खूब खाई। मास्टर साहब हमारी शिकायत करने हमारे घर भी यदा कदा आ जाते थे तब हमारे परिजन उन्हें जलपान तो कराते साथ ही हमें भरपूर मारने की अनुमति भी दे देते थे और मास्टर साहब के जाने के बाद हमारी कुटाई भी कर देते थे। इस मार से हमारी सहनशीलता भी बढ़ी और डर कारण पढ़ाई भी करने लगे, वाकई उस मार कुटाई वाली पढ़ाई का आनंद ही अलग था। वर्तमान पीढ़ी को तो डाटना भी एक आपराधिक कृत्य है।    

हमारा बस्ता यानि कपडे की थैली जोकि पुराने कपड़ों से हाथों सिलकर हमारी माँ बनाया करती थी, जिसे हम  बड़ी शान से ले जाया करते थे। हमारे उन बस्तों में कोई पार्टीशन नहीं होता था, अधिक से अधिक बस्ते के अंदर कम्पास के लिए एक पॉकेट बना दी जाती थी। ऐसा बस्ता आज देखने को भी नहीं मिलेगा, स्कूल  से आकर उस बस्ते को फेंककर माँ को खेलने जा रहा हूँ, ऐसा चिल्लाकर बोलने का भी एक अलग ही आनंद हुआ करता था। हमारे उस समय में वॉटर बैग नाम की कोई चीज अस्तित्व में ही नहीं हुआ करती थी, स्कूल की पानी की टंकी के नल से अपने हाथों की ओक बनाकर पानी पी लेते थे। टंकी साफ है या नहीं, पानी साफ है या नहीं, इसकी कोई चिंता नहीं थी बस हमारी प्यास शांत हो जाती थी पानी पीने के बाद बड़े इत्मीनान से शर्ट को ऊपर करके या शर्ट के आस्तीन से मुँह पोंछ लिया करते थे। आज बस्ते और वॉटर बैग की वैराइटी देखकर दिमाग काम नहीं करता है।   

घर से स्कूल पैदल जाने वाली पीढ़ी थी हमारी। कुछ संपन्न परिवार के बच्चे साईकिल से आते थे, साईकिल उस समय हमारे लिए लक्झरी जीवन का प्रतीक हुआ करता था। किराए की साईकिल मिला करती थी, कभी कभी किराए पर लेकर साईकिल का शौक पूरा किया जाता था किन्तु चेन गिरना आम बात होती थी और उसे चढ़ाना भी किसी कारीगरी से कम नहीं होता था। चेन चढ़ाने में परेशानी तो होती ही थी, हाथ भी काले हो जाया करते थे और वे ही हाथ चेहरे पर लग कर अनायास ही चेहरे को भी खूबसूरत बना  दिया करते थे। उन काले हाथों को धूल मिट्टी से पौंछने का भी अपना एक अलग ही मजा  होता था। पुरानी साईकिल खरीद बिक्री का भी खूब चलन था, किसकी साईकिल बिकने वाली है यह भी एक खबर बन जाया करती थी, मोलभाव करके सौदा तय होता था। साईकिल चलाने का भी एक क्रम होता था पहले आधा पैडल, फिर कैंची, उसके बाद डंडे पर, फिर सीट पर और अंत में डबल सवारी। वर्तमान समय में बच्चों को साईकिल तो बहुत ही जल्दी और सुलभता से  मिल जाती है। 

पढ़ाकू, ढब्बू और सामान्य यह तीन श्रेणी होती थी छात्रों की, अगली क्लास टॉपर कौन होगा यह सभी को मालूम होता था और किसे क्लास दुबारा पसंद आएगी यह भी मालूम होता था। कोर्स समान होता था तो पुरानी किताबों से भी पढ़ाई हो जाया करती थी।  किसके पास अच्छे हालत में किताबें मिलेंगी  यह भी खोज का विषय होता था। जिसके पास किताबें होती उसके पास चक्कर लगाकर, सिफारिश लगाकर किताबें ली जाती थी। किताबों का ध्यान से परिक्षण कर उसकी कीमत तय होती थी अधिकतर सौदा आधी कीमत में पक्का होता था।  किताबें मिलने के बाद बड़ी ख़ुशी होती थी और बड़े ही उत्साह से उन पर कवर चढ़ाया जाता था। पुरानी कॉपियों को भी संभाल कर रखा जाता था और उपयोग भी काफी संभाल कर किया जाता था। खाली पन्ने बचाये जाते थे जिन्हे बाद में अलग से निकाल कर इकट्ठा करके किसी प्रेस वाले की तलाश कर मोलभाव करके बाइंडिंग करवाई जाती थी। कई चक्कर लगाने के बाद जब कापियाँ मिलती तो ख़ुशी ख़ुशी लेकर आते। एक नई कॉपी चाहिए होती तो माँ से काफी सिफारिश करना पड़ती, दस  बार मांगने के बाद बड़ी मुश्किल  से मिलती। इस प्रकार से हमने ना को स्वीकारना तो सीखा ही साथ ही हमारी  सहनशीलता भी बढ़ी।    

सालभर में कपडे भी गिनती के ही मिलते थे एक स्कूल का, एक दीवाली के त्यौहार का और कभी परिवार में कोई विवाह आदि हो तो एक उस समय मिल जाता था। कई बार कपड़ों को फट जाने पर सिलवाया भी जाता था तो कभी पैबंद भी लग जाया करते थे किन्तु कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। त्यौहार और आने जाने के कपड़ों को संभाल कर पहना जाता था। आज केवल स्कूल  की ही तीन चार ड्रेस हो जाती है और नए कपडे आये दिन बगैर किसी आयोजन प्रयोजन के बच्चों को मिल जाते हैं कई कपडे तो बच्चे सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर देते हैं कि इनको कितनी बार पहनेंगे। मन से चाहा तो हमें तुरंत कभी मिला ही नहीं जिससे नकारने को सहन करने की आदत  भी लग गई। उस समय आर्थिक स्थिति चाहे  अच्छी हो या ख़राब बच्चों के प्रति समान व्यवहार था।  

हमारे परिजनों को हमारे सभी दोस्तों की जानकारी हुआ करती थी। कौन कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं  सब पर नजर होती थी। बिना वजह किसी प्रकार लाड़ प्यार नहीं होता था, गलतियां होती तो पहले कान पकडे जाते फिर अच्छी खासी मार भी पड़ती थी। केवल हमारी जरुरत भर का ही ध्यान रखा जाता था तो हम भी जमीन पर ही रहते थे। बड़ों का डर भी था तो सम्मान भी था। गलती करने पर बाहर का व्यक्ति भी पूछ लेता था कि तू अमुक का बेटा है ना यहाँ क्या कर रहा है, उन्हें उल्टा जवाब देने की हिम्मत नहीं होती थी और तो और हमारे घर पहुँचने के पहले हमारी खबर घर पहुँच जाती थी तो घर जाते ही कुटाई से स्वागत होता था। कई बार मार खाकर भूखा सोना पड़ता था तब घर का ही कोई चुपचाप से प्लेट में खाना लाकर प्रेम से खिलाता तो हम भी रोते रोते थोड़ा बहुत खाकर उन्हीं की गोद में सो जाया करते थे और अगले दिन सबकुछ भुलाकर अपने काम पर लग जाते थे। क्या आज यह संभव है? 

आज खाने के काफी विकल्प हैं, बच्चे नित नई जिद भी करते है, सामान्य भोजन तो पसंद ही नहीं करते। मनचाहा भोजन ही करते हैं। जबकि हमारी थाली में जो भी आ जाता था वही चुपचाप खाना पड़ता था क्योंकि यह मालूम था यह नहीं खाया तो कुछ नहीं मिलेगा और भूखा ही सोना पड़ेगा। हमें मालूम था कि  हम जैसा चाहें वैसा नहीं होना तो उस परिस्थिति को सहन करने की क्षमता हमारी बन गई थी आज के बच्चे को मालूम है कि थोड़ा नौटंकी करने और रोने चिल्लाने जिद करने पर सब मिल जायेगा तो वह मानेगा ही नहीं। उस समय जीवन सच्चा था दिखावा नहीं था, कोई अवास्तविक अपेक्षाएं नहीं थी। दोस्त दिल के करीब होते थे, सपनों की सीमाएं ज्ञात थी। माता पिता को अपने बच्चों की क्षमताएं ज्ञात थी इसलिए उनकी अपेक्षाएं भी अधिक नहीं थी। आत्महत्या जैसा विचार हमारी पीढ़ी के दिमाग में कभी नहीं आया क्योंकि हमने शुरू से ही अपमान सहते हुवे समाज में मानसिक संतुलन बनाये रखना सीख लिया था।   

स्लेट की बत्ती को जबान से चाटकर कैल्शियम की कमी को पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी तो पापबोध भी था कि कहीं विद्या माता नाराज ना हो जाये। पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था। पुस्तक के बीच पौधों की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जायेंगे ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास था। कपडे की थैली में किताबें ज़माने का हमारा कौशल था। हर साल नई कक्षा की कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था। माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई चिंता नहीं थी, ना ही हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझ थी, वे कभी हमारे स्कूल भी नहीं जाते थे। स्कूल में पिटते हुवे और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता, दरअसल हम जानते ही नहीं थे कि ईगो होता क्या है ? पिटाई हमारे जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया रही - पीटने वाला और पिटने वाला दोनों खुश रहते थे। पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे और पीटने वाला इसलिए खुश कि चलो हाथ साफ हुआ। हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं क्योंकि हमें आई लव यू कहना नहीं आता था। एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं । 

आज हम गिरते - सम्भलते , संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं । हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है, हमे हकीकतों ने पाला है, हम सच की दुनियां में थे। कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया, इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे। अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं, शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं। हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए। अपने इस मित्र दुर्गा प्रसाद शर्मा, एडवोकेट, इंदौर के निवेदन पर "एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे, समय बदला और सबकुछ बदल गया।” सही में हम कहाँ से कहाँ आ गए..............


Comments

Popular posts from this blog

बूंदी के हाडा वंशीय देशभक्त कुम्भा की देशभक्ति गाथा

महाभारत कालीन स्थानों का वर्तमान में अस्तित्व

महाभारत - भीष्म पितामह एवं भगवान श्री कृष्ण का संवाद